A child’s view of life following independence

(This post, in a way, is a sequel of ‘The little Warrior’ posted in August.) Independence brought no change in my life. I still had to go to school every day. I still could not join my brother and his friends in their fun and frolic every evening. On the positive side though, I could … Continue reading A child’s view of life following independence


1965 का युद्ध और मैं

"नाम?" "जितेंद्र  शंकर  भटनागर." "पिता  का  नाम?" "श्री  प्रेम  शंकर  भटनागर." "कहाँ  के  रहने  वाले  हो?" "शामली, ज़िला  मुज़फ़्फ़र  नगर  का." "D.D. College, मुज़फ़्फ़र  नगर  में  पढ़ते  थे?" "जी  नहीं. मुज़फ़्फ़र  नगर  में  इस  नाम  का  कोई College नहीं  है. S.D. College है." "क्या  तुमने  S.D. College से  M.A. नहीं  किया?" "मैंने  कभी M.A. किया  … Continue reading 1965 का युद्ध और मैं

सुधीर और मैं 

Is that your Chevrolet outside?’ He asked me. ‘It is not a Cheverolet. It’s a Buick.’ Replied I, scornfully. We both guffawed. यह  सुधीर  से  मेरी  पहली  मुलाकात  थी  जो   आगे  चल  कर  प्रगाढ़  मित्रता  में  बदल  गई. कुछ  समय  से  मैं  YMCA,  लखनऊ  में  रह  रहा  था.  दोपहर  का  खाना  खाने  के  लिए  वहीं  … Continue reading सुधीर और मैं