कश्मीर में दो हफ्ते

गर जन्नत  है  ज़मीन  पे  कहीं यहीं  पे  है  हमीनस्तो, हमीनस्तो, हमीनस्तो

श्रीनगर  पहुँचने  से  पहले  ही  फिरदौस  की  इन  पंक्तियों  की  सच्चाई  झलकने  लगी  थी.

हम, महाराणा भूपाल कॉलेज, उदयपुर के  भूगर्भ  विज्ञान  के  छात्र,  कश्मीर, जो  कभी सागर  में  था, में  पाए जाने  वाले  फॉस्सिल्स  एकत्र  करने  और  उनका  अध्ययन  करने  के  लिए  श्रीनगर  आए  थे. हम सभी झेलम में दो हाउस बोट्स में ठहरे  थे. अक्तूबर का महीना था  लेकिन  ठंड  काफ़ी  अधिक  थी.  इसलिए सभी अपने गर्म कपड़े और  लिहाफ़  साथ  लाए  थे.  श्रीनगर रियासत की  राजधानी  के  अलावा  पर्यटक  स्थल  भी.  इस कारण शहर बहुत साफ सुथरा था. हाउस  बोट्स  तो  मानो  छोटे  छोटे  महल  हों. फर्शों  पर  खूबसूरत  क़ालीन  और  हर  ओर  फूलों की  छटा. दूर  तक  झेलम  का  स्वछ  पानी  और  हर  थोड़ी  दूर  पर  ऐसी  ही  हाउस  बोट. इस  खूबसूरत  मंजर को  चार  चाँद  लगा  रही  थी  झेलम  के  बीचों  बीच  सुंदर  सी  सफेद  हाउस  बोट. ‘Suffering Moses’  नाम  की यह  बोट  एक  दुकान  थी  जिस  पर  तरह  तरह  की  कीमती  वस्तुएँ  मिलती  थीं  हम  विद्यार्थियों  की  पहुँच  के बाहर  थी.

थोड़ी  दूर  पर  डल  लेक  थी. यहाँ  भी  हर  ओर  फूल  ही  फूल  दिखाई  पड़ते  थे. झील  में  हाउस  बोट  और शिकारों  के  अलावा  फूल-पौधों  के  छोटे  छोटे  तैरते  हुए  टापू  हवा  और  लहरों  के  साथ  अपनी  जगह  बदलते रहते  थे. यह  प्राकृतिक  टापू  थे. इनके  बीच  में  शिकारे  पर  बैठ  कर  सैर  का  आनंद  कुछ और ही था.

बॉलीवुड  फिल्मों  में  हीरो-हीरोइन  पेशे  से  डॉक्टर, वकील, टीचर या कुछ और होने पर भी अपने काम पर कम और  नदिया  किनारे  या  रेस्टोरेंट  में  या  पार्क  में  किसी  पेड़  के  चारों  ओर  नाचते  गाते  एक  दूसरे  के  प्रति  प्रेम  का  इज़हार  करते  अधिक  नज़र  आते  हैं. दर्शकों  को  लगने  लगता  है  कि  उनके  पास  इसके  सिवा  कोई  और  काम  है  ही  नहीं. हम  विद्यार्थियों  को  कश्मीर  में  देखने  वालों  को  भी   लगता  होगा  कि  हम  वहाँ  सिर्फ़  घूमने  आए  हैं. पढ़ाई  तो  एक  बहाना  था. लगभग  दो  हफ्ते  के  कश्मीर  प्रवास  में  हम  लोग  तीन  चार  दिन  से  ज्‍यादा  फॉज़िल्स  आदि  के  लिए  नहीं  निकले. बाकी  समय  घूमने  फिरने  में  ही  बिताया. हम  गुलमर्ग  की  सैर  करते  हुए  तनमर्ग  के  तंग  मार्ग (जो  इतना  तंग था  कि कभी भी पैर फिसल  कर  खाई  में  गिरने  का  डर  लगा रहता था) से  होते  हुए  खिलनमर्ग  जा  पहुँचे. बर्फ  पड़ी  हुई  थी. ठंड  के  कारण दाँत  किटकिटा  रहे  थे. लग  रहा  था  कि  शरीर  का  खून  जम  गया है. खुले आसमान  के नीचे  एक  आदमी  को  चाय  बेचते  देख  सभी  खुशी  से  जैसे  पागल  हो  गये.  उन  दिनों  नीचे  मैदान  में  चाय  पचास  पैसे  की  मिलती  थी. उसी  चाय  के  पाँच  रुपये  हर एक ने  बिना किसी हील हुज्जत के  दे  दिए.

निशात  बाग़, शालीमार  बाग़, चश्मा  शाही  वगैरह सभी कुछ घूमा हमने. यहाँ  तक  कि  शम्मी  कपूर सायरा  बानू  की  फिल्म ‘जंगली’  के  गाने  ‘काश्मीर  की  कली  हूँ  मैं’  की  शूटिंग  देखने  से  भी  नहीं  चूके  हम. वुलर  लेक,  जिसकी  गिनती एशिया  में  ताजे पानी  की  सबसे  बड़ी  झीलों  में  की  जाती  है,  का  भी  एक  चक्कर  बस  से  लगाया.  श्रीनगर  और उसके आस  पास  की  जगहें  देखने  के  बाद  हम  पहलगाम  जाकर  लिद्दर  के  किनारे खालसा  होटल  में  ठहरे. यह  वही  खालसा  होटल  है  जो  एक  साल  बाद  बादल  फटने  के कारण  नेस्तनाबूद  हो  गया  था. पहलगाम  में  सीपी  और  शंख  आदि  के  फॉस्सिल्स  चारों  ओर  इस  तरह  बिखरे  हुए  थे  जैसे  अपने  यहाँ  भंडारे  के  बाद  झूठी पत्तल.  हमारे  लिए  बेकार.

अगले  दिन  सुबह  सुबह  हमारी  पूरी  पार्टी  पेट  भर  नाश्ता  करके  चंदनवारी  के  लिए  निकले. 15-16  किलोमीटर  दूर  चंदनवारी  तक  पैदल  या  खच्छर  से  जाया  जाता  था. हममें  से  अधिकतर  लोग  खच्छर  से  जाने  वालों  का  मज़ाक  उड़ाते  हुए  पैदल  ही  गये. चंदनवारी  पहुँचते  पहुँचते  मौसम  बहुत  खराब  हो  गया  था. बेहद  ठंड  तो  थी  ही. भूख  भी  लगने  लगी  थी. लेकिन  वहाँ  तो  चाय  तक  नसीब  नहीं  हुई. सभी  दुकानें  खराब  मौसम  व  बर्फ  पड़ने  के  डर  से  बंद  हो  चुकी  थीं. एक आदमी  जो  वहाँ  मिला  उसने  कहा  कि  आगे  कोल्होई  ग्लेशियर  जाने  के  लिए  मौसम  ठीक  नहीं  है. बर्फ गिरने  के  पूरे  आसार  हैं  और  हम  वहाँ  फँस  जाएँगे. हम  फिर  वहीं  से  वापस  चल  पड़े. हाँ, वहाँ  का  मशहूर  ‘स्नो ब्रिज’  हमने अवश्य  देखा. दो  पहाड़ियों  के  बीच  में  बहुत  मोटी, शायद  २०-२५  फुट  से  भी  ज़्यादा,  बर्फ  की  पर्त  के  नीचे  से  बहती  बर्फ़ीली  लिद्दर  का  मनोरम  दृश्य  देखते  ही  बनता था. वहाँ  से  हटने  का  मन  ही  नहीं  था  लेकिन  रुक  कर  बर्फ़बारी  में  फँसना  भी  ठीक  नहीं  था.  मन  मार  कर सभी  वापस  चल  पड़े. पहलगाम  पहुँचने  में  रात  हो  गई. थकान और  भूख  से  सभी  व्याकुल  थे.  गर्म  पानी  की  इंतज़ार  किए  बिना  मैं और  मेरे  दोस्त मनोहर दामले,  सुरेंद्र  पुरोहित  और  रमेश  व्यास   लिद्दर  के  बर्फ़ीले  पानी  से  ही  नहा  कर  खाना   खाने  पहुँचे. हम २८ लड़के  और  हमारे  प्रोफेसर  इतने  भूखे  थे  कि  थोड़ी  देर  में  होटल  वाले  ने  आटा  ख़त्म  हो  जाने  की  वजह  से  और  खाना  खिलाने  से इनकार कर  दिया.

उदयपुर  वापस  जाने  का  समय  करीब  था. लौटते  हुए  एक  दिन  श्रीनगर  में  और  रुके.  मनोहर को एक स्वेटर लेना था. इसलिए हम चारों  दोस्त  एक  दुकान  पर  सौदेबाज़ी  कर  रहे  थे. अचानक  रमेश  ने पूछा, ‘आप  लोग  ये  ऊन  कहाँ  से  लाते  हैं?’

‘कुछ  हमारे  कश्मीर  में  होता  है. कुछ  आपके  इंडिया  से  लाते  हैं.’ जवाब  सुन  कर  खून  खौल  गया.

‘कश्मीर  क्या  इंडिया  के  बाहर  है? क्या  आप  लोग  इंडियन  नहीं  हैं?’ हम  चारों  उन  दुकानदारों  से  उलझ  गये.  बहस  का  कोई  नतीजा   तो  निकलना  नहीं  था. उन  लोगों  ने  एक  स्वेटर  की  बिक्री  का  नुकसान  ज़रूर  उठाया.

पच्चीस  सालों  से  चल  रहा  आतंकवाद, पिछले  दिनों  की  दुखद  घटनाएँ  और  तीन  दिन  पहले  अमरनाथ  यात्रियों  पर  हमला, यह  सब  उसी  सोच  की  वजह  से  है  जो  1960  में  स्वेटर  खरीदते  समय  हमने  देखी  थी. कश्मीरी  तब  भी  अपने  आप  को  इंडियन  नहीं  मानता  था.
 

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8 thoughts on “कश्मीर में दो हफ्ते

  1. विचार जो हम या हमारी उस समय की सरकार बदल नहीं पाई तभी आज ये हाल है

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  2. कश्मीर का उस समय का वर्णन सुंदर व आकर्षक है विशेष कर प्रकृति का। मनमोहक दृश्य देखने को मन ललचा उठा।

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    1. कभी का जन्नत फिलहाल तो दोजख बना हुआ है और वहाँ जान हथेली पर रख कर ही जाया जा सकता है. पता नहीं इस जन्म में जा सकेंगे दोबारा या नहीं.

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  3. सुन्दर ता का अति उत्तम वर्णन लिखा है ।हर भारत वासियों को कश्मीर के लिए आवाज उठानी होगी। वहाँ पर रह रहे हर नागरिक को भरोसा करना होगा वह यहां के नागरिक हैं जिसे भारत कहते है। काश्मीर हमारा है और हमेशा रहेगा। ना कि राजनीति का मोहरा बनेगा।

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    1. धन्यवाद मंजुल भाभी. कश्मीर तो हमारा ही था, है और रहेगा. जबतक कश्मीरी अपने को हिन्दुस्तान का नागरिक नहीं मानेगा, कश्मीर की समस्या सुलझ नहीं सकती.

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