सुहाना सफ़र ४

“यह हाथ में पट्टी क्यों बँधी है?” बाँये हाथ में पट्टी बँधी देख कर मेरे मित्र विनोद ने कुछ इस अंदाज़ में पूछा मानों कोई रहस्य जानना चाहता हो.

“छुरा लग गया” मैंने संजीदगी से  जवाब दिया.

“छुरा लग गया? कैसे?” विनोद ने जानना चाहा.

हमारे परिवार का एक बड़ा सा फार्म है ऋषिकेश के पास जहाँ अन्य फसलों के अलावा फल फूल के पौधे भी उगाए जाते थे, ख़ासतौर पर गुलाब के पौधे. सन् १९७२ में जवाहर लाल नेहरू गार्डन, श्रीनगर, कश्मीर से १०,००० गुलाब के पौधे सप्लाई करने का ऑर्डर मिला. इतने पौधे हमारे पास नहीं थे. महरौली, दिल्ली में बड़े पैमाने पर गुलाब की खेती होती थी. तय किया कि महरौली से पौधे खरीदे जाएँ.  इस आशय से मैं अपने घर मुज़फ़्फ़रनगर से बड़े भाई नरेंद्र के पास रुड़की पहुँचा जहाँ से हम दोनों दोपहर के खाने के बाद अपनी पुरानी सी फ़िएट में सवार होकर दिल्ली के लिए निकल पड़े. शामली में माता पिता के साथ शाम की चाय पीते हुए कुछ समय बिताया और सूरज छिपने से कुछ पहले आगे चले.

सूरज छिपने के बाद मेरठ डिवीज़न के राजमार्गों पर यात्रा करना ख़तरे से खाली नहीं है. लूट पाट एक मामूली घटना मानी जाती है. खरीदने के लिए काफ़ी नगद हमारे पास था इसलिए भाई साहब ने अपनी पिस्तौल भी रख ली थी. पिस्तौल, जो कुछ समय पहले ही विदेश से मंगाई गई थी, के साथ पाँच गोलियाँ भी आईं थी. मैंने न कभी पिस्तौल चलाई थी न ही मुझे कार चलानी आती थी. फिर भी पिस्तौल सीट पर रखी गई और भाई साहब ने मुझे ज़ुबानी ट्रेनिंग देते हुए निर्देश दिया कि अगर रास्ते में हमें कोई लूटने की कोशिश करे तो मैं बिना हिचकिचाए गोली चला दूँ. इस तरह पूरी तैय्यारी के साथ हम शामली से दिल्ली के लिए चल पड़े.

अंधेरा हो गया था. हेडलाइट जला ली गई थीं. भाई साहब गाड़ी चलाते रहे और मैं, मन ही मन, पिस्तौल चलाने की प्रैक्टिस करता रहा. सोचा कि सड़क पर लुटेरे रुकावट करेंगे, भाई साहब को गाड़ी रोकनी पड़ेगी, एक आदमी छुरा लेकर मुझ पर हमला करेगा, मैं गोली चला दूँगा, भाई साहब प्लान के मुताबिक यू-टर्न लेंगे और इस तरह हम लोग लुटने से बच कर वापस शामली चले जाएँगे. भाई साहब और मैं पूरी तरह सतर्क थे, हर दिशा में आँखें गड़ाए बढ़ते जा रहे थे. अचानक जिसका  डर था वही हो गया. बीच सड़क पर एक ट्रैक्टर खड़ा था. तीन चार आदमी उसके दोनों ओर खड़े थे. भाई साहब ने ब्रेक लगाया. बड़ी बड़ी दाढ़ी मूँछ, पगड़ी बाँधे, ख़तरनाक सा दिखने वाला एक आदमी मेरी तरफ बढ़ा. मैंने पिस्तौल उठाई. वो आदमी पास आ गया था. मैं घबराहट में पिस्तौल का सेफ्टीकैच खोल नहीं पा रहा था. अब वो मेरे बिल्कुल पास था. गाढ़े की चादर में से, जो उसने ओढ़ रखी थी, एक हाथ निकला. उस हाथ में छुरा . . . . . नहीं था. “ट्रैक्टर खराब हो गया है. कच्चे में को निकाल ले” वो बोला.

धीरे से गाड़ी कच्चे में उतारी और वापस सड़क पर आ कर सरपट भागे. इससे पहले कि मुँह के रास्ते बाहर निकलते दिल को सम्भाल पाता गाड़ी की हेडलाइट बंद हो गईं. सड़क नज़र नहीं आ रही थी. रुकना ख़तरे से खाली नहीं था. टॉर्च की रोशनी से सड़क देखने की कोशिश व सामने से आने वाली इक्की दुक्की गाड़ी को यह एहसास कराते कि हम कार हैं धीरे धीरे बढ़ते रहे. एक पेट्रोल पंप दिखा. रुक कर इंक्वाइरी करी. कोई ऑटो एलेक्ट्रीशियन इतनी देर रात गये नहीं मिला. एक ट्रक चालक ने कहा कि वो कर सकता है. मरता क्या न करता. उसने डैशबोर्ड के कुछ तारों को अपने हिसाब से जोड़ा और लाइट जलने लगीं. खुशी खुशी आगे बढ़े. बहुत देर तक नहीं चल पाई हमारी खुशी. रबर जलने की बदबू के साथ गाड़ी में धुआँ भरने लगा. जल्दी जल्दी तार अलग करने की कोशिश में भाई साहब के हाथ भी जल गये. हेडलाइट फिर बंद हो गयीं. पहले की तरह टॉर्च की मदद से धीरे धीरे आगे बढ़ते रहे और दिल्ली तक का १०० कि. मी. का सफ़र, जो  तीन घंटे में हो जाना चाहिए था, आठ घंटे में पूरा किया.

दो दिन बाद पौधों से लदी गाड़ी लेकर हम लोग शाम को दिल्ली से सहारनपुर, जहाँ से पौधे ट्रक में लदवाने थे, के लिए चले. हम दोनों बुरी तरह थके हुए थे. ड्राइव भाई साहब को ही करना था. इस डर से कि चलाते हुए नींद न आ जाए, उन्होंने जागने की गोली खा ली थी. इस बार गाड़ी ने, जो हमने दिल्ली में ठीक करा ली थी, कोई तकलीफ़ नहीं दी. मज़े से चलते रहे हम लोग, तब तक जब तक मैने यह नहीं देखा कि गाड़ी सड़क छोड़ कर कच्चे में उतरती हुई गड्ढे की ओर जा रही है. भाई साहब की आँखें बंद थीं. सो गये थे वो. स्टियरिंग घुमा कर गाड़ी को गड्ढे में जाने से बचाते हुए चिल्ला कर भाई साहब को जगाया. उन्होंने गाड़ी ठीक से किनारे लगाई और बैठे बैठे ही सोने लगे.

फार्म से भी पौधे सहारनपुर आ चुके थे. सभी पौधों को लकड़ी के खोखों में पैक करके उन पर लोहे की पत्ती लगाते हुए मेरे हाथ में चोट लग गई. इसी चोट पर बँधी पट्टी के बारे में विनोद ने ऐसे रहस्यमय अंदाज़ में पूछा था कि मुझे एक छोटे से संशोधन के साथ यह घटना सुनानी पड़ी. संशोधन केवल इतना कि ‘गाढ़े की चादर में से जो हाथ निकला उसमें छुरा था जो मेरे हाथ में लगा. दूसरे हाथ से मैंने गोली चलाई जिसके लगने से वो आदमी गिरा और हम तेज़ी से आगे निकल गये. पता नहीं वो आदमी सिर्फ़ घायल हुआ या . . . . .’

काफ़ी बाद में पता चला कि जिसे हम पिस्तौल समझ कर साथ ले गये थे वो एक लोहे के टुकड़े से अधिक कुछ न था. उसके साथ आईं पाँचों गोलियाँ बेकार हो चुकी थीं. चली ही नहीं.

 

 

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