सुहाना सफ़र ३ – दाल-बाटी

१९७५ में, जब इंदिरा गाँधी ने देश में आंतरिक आपातकाल की घोषणा की, मैं दिल्ली में एक निजी कंपनी में कार्यरत था. १९७६ में मेरा तबादला इंदौर हो गया. मुझे दिल्ली से रतलाम तक ट्रेन से जाना था. दो दिन रतलाम, एक दिन उज्जैन और एक दिन देवास में काम करते हुए इंदौर पहुँचना था. सुबह सुबह रतलाम के होटल में कमरा लिया, नाश्ता किया और स्कूटर, जो मैं ट्रेन में साथ ही लाया था, पर सवार हो कर काम पर निकल पड़ा. शाम को बाज़ार में घूमते हुए देखा कि एक दुकान में दाल-बाटी मिल रही है. मुँह में पानी आ गया. बचपन के दिन याद आने लगे, जब नागपुर में अम्मा लकड़ी के चुल्हे की गर्म राख में बाटी बनाया करती थीं और हम सभी भाई बहन चटखारे ले ले कर खाते थे. पेट में जगह ना होने पर भी मैं अंदर चला गया. अंदर लकड़ी की मेज़ कुर्सी पड़ी थीं जिन्हें देखते ही पता चल जाता था कि सफाई के कपड़े से उनकी अधिक दोस्ती नहीं थी. कहने पर लड़के ने एक मैले से कपड़े से मेज़ पर पड़ी झूठन, जो पहले दो तीन जगह ही थी, समान रूप से पूरी मेज़ पर फैला दी. संतुष्ट होकर कर बोला, “तीन बाटी एक रुपया, घी एक रुपया” और इंतज़ार की मुद्रा में खड़ा हो गया.
“सबसे पहले ठीक से मेज़ साफ करो. उसके बाद दो बाटी और घी ले आओ” मैंने कहा.
“तीन से कम नहीं मिलतीं”, उत्तर देते हुए उसने अनिच्छा से दोबारा मेज़ साफ करने का उपक्रम किया.
“क्यों?” बची हुई गंदगी साफ करवाते हुए मैनें प्रश्न किया.
“कम से कम तीन देते हैं.”
“मुझे दो ही खानी हैं.”
“दो नहीं देते.”
इस दो-तीन की बहस में आवाज़ें थोड़ी उँची हुईं और काउंटर पर बैठा अधेड़ व्यक्ति उठ आया. उसने भी लड़के की बात की ताकीद की, “तीन से कम हम नहीं देते. दो नहीं मिलेंगी.”
“तीन मैं नहीं खा सकता. बर्बाद मैं करना नहीं चाहता. पैसे आप तीन के ले लेना. मुझे दो ही चाहिए” मैं बोला.
मालिक रहा होगा वह. लड़के से बोला. “दे दे दो बाटी.”
घी में तर स्वादिष्ट दाल बाटी खा कर काउंटर पर दो रुपये का नोट रख मैं बाहर की ओर निकला ही था की आवाज़ आई, “रुकिये.”
पलट कर देखा तो काउंटर पर बैठे अधेड़ व्यक्ति को इशारा करते पाया.
“बाकी पैसे लेते जाइए.” उन्होंने कहा.
“बाकी पैसे?” मैं हैरान था.
“हाँ, आपके ३५ पैसे बचते हैं”
“कैसे?”
“आपने दो ही बाटी खाईं हैं. ६५ पैसे हुए.”
“पर आप तीन से कम तो देते ही नहीं ना.”
“वो इसलिए कि यहाँ लड़के-फड़के आते हैं, एक बाटी लेते हैं और घंटों बैठे रहते हैं. ग्राहकी खराब करते हैं. आप दो से ज़्यादा खा ही नहीं सकते तो हम तीन के पैसे कैसे ले सकते हैं?” दिल्ली में तो ऐसा कभी नहीं होता. ३५ पैसे जेब में रख कर और मन ही मन इस सज्जन पुरुष को नमन करते हुए मैं चल दिया.
अगले दिन काम करने के बाद रात को पर्स टटोला तो लगा कि इंदौर तक पहुँचने के लिए पैसे कम पड़ सकते हैं. उज्जैन और देवास में भी होटल लेना होगा और स्कूटर में पेट्रोल भी डलवाना होगा. इस उधेड़बुन में सो भी नहीं सका. क्या होटल वाला मान जाएगा कि मैं बाद में मनीऑर्डर से पैसे भेज दूँ? शायद नहीं. कैसे विश्वास करेगा एक अजनबी पर? पूछ कर देखूं? पूछने में क्या हर्ज है? मना ही तो कर देगा. पूछूँगा सुबह. नींद कब आ गई पता नहीं चला.
सुबह होटल वाले ने आश्चर्यचकित कर दिया. बिना हिचकिचाहट के मान गया. जान में जान आई. कुछ तो सहारा लगा. सामान स्कूटर के पीछे बाँधा और एक पेट्रोल पंप पर जाकर कहानी दोहराई. यहाँ भी सफलता मिली. कैसा शहर है रतलाम? टंकी फुल कराई और इस वायदे के साथ कि मनीऑर्डर से पैसे भेज दूँगा, रतलाम और रतलाम के बाशिंदों को दुआएँ देता हुआ उज्जैन की ओर चल दिया. अब मेरे पास इतने पैसे थे कि किफायत से खर्चा करके इंदौर तक पहुँच जाऊं.
मनुष्यता अभी बाकी है. तीन चार साल पहले दिल्ली में भारी वर्षा में दिखाई नहीं देने के कारण मेरी कार गड्ढे में लटक गई थी. मेरे पास कोई साधन नहीं था गाड़ी को निकालने का. सड़क पर कोई मददगार भी दिखाई नहीं दे रहा था. समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ. तभी चार पाँच आदमी पीले हेल्मेट लगाए आते दिखे. अवश्य दिल्ली मेट्रो का काम करते होंगे. खुद ही रुक गये मेरे पास आकर. खुद ही मदद देने की पेशकश की और पाँच मिनट में गाड़ी सड़क आ गई. मैंने पैसे देने चाहे तो “मदद करना हमारा फर्ज़ है” कहते हुए चले गये.
अभी कुछ समय पहले नैनीताल में मेरी कार में पंक्चर हो गया. घुटनों में तकलीफ़ होने के कारण पहिया बदलना कठिन था. थोड़ी पूछताछ के बाद एक आदमी इस काम के लिए मिला. बातों बातों में पता चला कि वो एक टैक्सी ड्राइवर है जो टूरिस्ट लेकर मेरठ से आया है. काम पूरा होने से पहले ही उसकी सवारियों ने उसे आवाज़ लगानी शुरू कर दी. उन्हें देर हो रही थी. फिर भी उसने पहिया बदला और बदलते ही भाग चला अपनी टैक्सी की ओर. मैं पीछे से चिल्लाया, “कुछ लेते तो जाओ”. उसने पीछे मुड़ कर देखा और कहा, “बस दुआएँ दीजिएगा”.
इनमें से किसी भी महानुभाव का नाम मुझे नहीं मालूम. जब तक ऐसे लोग दुनिया में हैं आशा भी है. इन सभी महापुरुषों को मैं प्रणाम करता हूँ.

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