सुहाना सफ़र २

आज से ५-६ दशक पहले देश में यात्रा करने के दो ही साधन थे, रेलगाड़ी और बस. दोनों की यात्रा काफ़ी मनोरंजक होती थी. नज़दीक की छोटी यात्रा अधिकतर बस द्वारा ही की जाती थी. बस अड्डे पर रुकते ही चना, मूँगफली आदि बेचने वाले हमला कर देते थे और कुछ यात्री खरीद भी लेते थे. इनके अलावा चूरन, सिर दर्द, दाँत दर्द आदि की दवाएँ बेचने वाले भी बस में चढ़ जाते थे और कुछ दूर तक बस में ही चल कर बड़े मनोरंजक तरीके से अपना समान खरीदने के लिए फुसलाते थे. मुज़फ़्फ़रनगर से मेरठ के रास्ते में अक्सर एक व्यक्ति स्थानीय बोली में मंजन इस प्रकार से बेचता था.

” भाइयों और बहनों, मेरा नाम है रमेस और में यो पास के गाम का रहने वाला हूँ और मेरे गाम का नाम है भैंसा. पर तम बुग्गी मैं जोतने वाला झोट्टा ना समझ लियो कदि वोई समझ लो (जनता हँसी). तम नूं सोच रे होगे अक भाई इसकी झोल्ली मैं के है, यो के बेचन लग रा. भाइयों मेरी झोल्ली मैं है एक रामबाण दवा जिसै तैयार किया है मसहूर बैदराज नागराज जी नै. कई बरसों की कड़ी तपस्या का नतीज्जा है यो दवा. हर बीमारी का इलाज हो सकै इस्से. थारे सिर मैं दरद हो तो ठंडे पानी से एक फंकी मार लो. दरद गायब. पेट मैं दरद होवे या कब्जी होवे तो ठंडे की जगा गरम पानी का इस्तेमाल करो. फ़ौरन आराम मिलैगा. रात को सोत्ते हुवे थारे दाँत मैं दरद हो गया तो के करोगे? चीक्खोगे, ‘अरै रामू, अरै श्यामू, तू तो सो रा. मैं तो रो रा. अरै कुछ तो कर’. कुछ ना करै. किसी को ना जगावै. बस एक चुटकी दवा हथेल्ली पै रख कै उंगली सै मन्झन की तरिओं दाँत मैं लागा लेवे. मिंटो मैं आराम. जो कर रा था ‘आह, आह, आह वो करैगा वाह, वाह, वाह’. दवा को दुकान पै खरिद्दन जाओगे तो यो घनि महँगी मिलेगी. भाइयों ऐसी रामबाण औषधि के प्रचार और जनता की सेवा कै लिए वैद्यराज नागराज जी सिरफ़ लागत पर बेच रहे हैं. लागत है सिर्फ़ एक रूपिया,एक रूपिया,एक रूपिया. जो भाई लेना चाह्वैं एक रूपिया खुला तैयार रखें”.

ऐसा नहीं है कि मनोरंजन केवल बेचने वालों से ही होता हो. यात्री भी मनोरंजन का एक अच्छा ज़रिया होते हैं. एक बार लखनऊ से हरदोई का सफ़र बस से किया. बराबर में बैठे यात्री को देखते ही पता चल गया वो एक छोटा मोटा दुकानदार है. बस चलने के कुछ समय बाद उसने अपने थैले में से एक बटुआ निकाला. मैं हैरानी से देखता रह गया. इस किस्म के बटुए कम से कम पचास वर्ष पहले लुप्त हो चुके थे. बटुए के दोनों ओर की तनियो को खींच कर खोला और उसमें से एक छोटी सी पीतल की डिब्बी निकाली. डिब्बी में चूना था. एक चुटकी चूना बांई हथेली पर रखा. फिर डिब्बी को बांये हाथ की उंगलियों और अंगूठे से पकड़ कर दाहिने हाथ से ढक्कन लगा कर बटुए में रखा. अब बटुए में से एक पूडिया निकली. इसमें था तंबाखू जिसकी दो चुटकी चूने के साथ मिल गईं और बाकी का तंबाखू बटुए में. दाहिने अंगूठे से बांई हथेली पर रखे चूने और तंबाखू को अच्छे से रगड़ने के बाद दाहिने हाथ की चारों उंगलियों से इस मिश्रण को तीन चार बार थपक कर चौड़ा सा मुँह खोला और एक साथ पूरे की फंकी लगा ली. एक बार फिर बटुआ, जो बंद किया जा चुका था, खोला. उसमें से एक और छोटी सी पोटली निकली. उसे खोला. उसमें बारीक बारीक कटी हुई सुपारी थी. सुपारी का एक अच्छा ख़ासा हिस्सा भी उनकी मुँह की गुफा में लुप्त हो गया. यह सुनिश्चित करके कि सभी सामग्री वापस रख ली गई है, बटुआ जिस प्रकार खोला था उसी प्रकार बंद किया, थैले में रखा, और अब निश्चिंतिता से आँखें बंद करके, जुगाली करते हुए स्वनिर्मित खेनी का आनंद लेने लगे. लगभग पाँच मिनट की यह प्रक्रिया मुझे भी आनंदित करती रही. और पाँच मिनट के बाद, बिना इस बात की चिंता किए कि पीछे बैठे मुसाफिरों के ऊपर जा सकता है, उन्होंने खिड़की के बाहर मुँह निकाला और फचाक से थूक दिया.

अभी पिछली जून में हरिद्वार से दिल्ली का सफ़र मुझे बस से करना पड़ा. जून की भीषण गर्मी में दोपहर तीन बजे बस चलने को हुई. तभी एक लंबा चौड़ा, घनी दाढ़ी, लंबे बालों वाला हिप्पी जैसा दिखने वाला गोरा पीठ पर भारी सा बैकपैक लादे बस में चढ़ा. बस भरी होने के बावजूद उसे पीछे एक सीट मिल ही गई. बस में उँची आवाज़ में गाने बज रहे थे. पीछे से आवाज़ आई, “ज़रा आवाज़ कम कर लो ड्राइवर, मुझे अपना म्यूज़िक सुनाई नहीं पड़ रहा है”. पलट कर देखा कि कान में इयरप्लग लगाए हिप्पी यह दरख्वास्त कर रहा है. अचरज हुआ. एक गोरा और इतनी अच्छी हिन्दी! खैर, आवाज़ थोड़ी कम हो गई. बस चलती रही. सब जानते हैं अपने देश की सड़कें, गाड़ियाँ, और ड्राइवर कैसे हैं. ड्राइवर बस की, और अपनी भी, सामर्थ्य से अधिक रफ़्तार से बस चला रहा था. सड़क की सतह खराब होने और बार बार ब्रेक लगाने के कारण बस खड़खड़ करती चल रही थी. झटके लग रहे थे और कुल मिलाकर काफ़ी तकलीफ़देह सफ़र साबित हो रहा था. तभी पीछे से फिर आवाज़ आई, “गाड़ी ठीक से नहीं चला सकते क्या? बच्चे सीट से नीचे गिर रहे हैं”. वही गोरा हिप्पी था यह. स्पीड में कुछ खास अंतर नहीं आया. अब गोरा आग बाबूला हो गया. “अपने सूपरवाइज़र का नंबर बताओ. मैं तुम्हारी शिकायत करूँगा. तुम्हें गाड़ी चलानी नहीं आती?” ड्राइवर के पास वाली सीटों पर बैठे तीन-चार लड़के, जो शायद बस स्टाफ ही थे, हंसते हुए नारे लगाने लगे, ” बोल शंकर भगवान की जय”. नारेबाज़ी के बाद ड्राइवर ने नंबर दे दिया. गोरे ने फोन किया. गाड़ी चलती रही. झटके लगते रहे. गोरा फिर चिल्लाया, ” अरे, गाड़ी ठीक से चला”. इस बार कंडक्टर ने जवाब दिया, “गड़डी तो नूंई चलैगी”. नारे फिर लगने लगे. वातावरण काफ़ी मनोरंजक हो चला था. इस बीच गोरे ने फिर किसी को फ़ोन किया. “मैं करण त्रिवेदी बोल रहा हूँ (अरे, ये तो देसी निकला!). तू रोडवेज़ में किसी को जानता है क्या? ये ड्राइवर बस ठीक से नहीं चला रहा है. मैंने सूपरवाइज़र को फोन तो कर दिया है. उसका फोन ड्राइवर को आता होगा. तू भी कर देगा तो अच्छा रहेगा. यहाँ लड़ाई हो सकती है. आजकल सभी गुंडे हैं. पर मैं पहले हाथ नहीं उठाऊँगा. तू यह कॉल रेकॉर्ड कर लेना. कोर्ट में जाना पड़ सकता है. यह सबूत होगा हमारे पास.” गुंडे वाली बात लड़कों को बुरी लगी होगी ही. नारेबाज़ी फिर होने लगी. लड़के हंसते रहे. गोरा (अब तक उसे गोरा कहा है तो आगे भी यही ठीक रहेगा) अपना बैकपैक लेकर अब दरवाज़े के पास फर्श पर बैठ गया. फ़ोन करता रहा. बस चलती रही.
धुन्धल्का हो चला था. अचानक गोरा चिल्लाया, “ठीक से नहीं चलानी है तो मुझे उतार दो”. बस रुक गई. गोरा उतर गया. कंडक्टर बोला, ‘इसे पता नहीं है, अंधेरे के बाद यहाँ क्या क्या होता है”. नारा लगा, “बोल शंकर भगवान की जय”. साथ में ज़ोर की हँसी. ड्राइवर ने गियर लगाया, बस हिली, और गोरा कूद कर बस में वापस आ गया. कंडक्टर से बोला, “बताना था ना कि यहाँ उतरना ठीक नहीं है. फिर हँसी. गोरा फर्श पर ही बैठ गया. कुछ देर में फ़ोन निकाला. बोला, “शायद सूपरवाइज़र का फ़ोन आ गया है. बस अब ठीक चल रही है. ड्राइवर भी क्या करे. सड़क ही ऐसी है”. फिर हँसी. गोरा फर्श पर ही बैठ गया. इस बार मेरी बारी थी हँसने की. मन ही मन में हंस कर काम चला लिया मैंने. गोरे ने बैकपैक से एक मोटी सी बाँसुरी निकाल कर बजानी शुरू कर दी. लड़के मुस्करा कर गोरे को उत्साहित कर रहे थे. उन्होंने गोरे से बिसलेरी की बोतल पानी पीने के लिए माँगी जो उसने बड़ी उदारता से दे दी. लड़के और गोरा बोतल को मुँह लगा लगा कर पानी पीते रहे. सुलह हो गई. गपशप होने लगी. लड़कों ने बाँसुरी भी माँग ली और उल्टी सीधी बजाते रहे. दिल्ली आने तक यही होता रहा.

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